एक अधूरी दुआ और खुदा का फैसला






शहर के शोर-शराबे से दूर एक छोटा सा घर था, जहाँ सादिक नाम का एक नेक इंसान रहता था। सादिक की ज़िंदगी की एक ही ख्वाहिश थी—उसका बेटा एक बड़ा अफसर बने। उसने अपनी पूरी जवानी मजदूरी में झोंक दी ताकि बेटे की पढ़ाई में कोई कमी न रहे।

वक्त गुज़रा, बेटे की पढ़ाई पूरी हुई और उसे शहर के सबसे बड़े बैंक में नौकरी मिल गई। सादिक की आँखों में खुशी के आंसू थे। उसे लगा कि उसकी बरसों की दुआ कुबूल हो गई। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।

नौकरी लगने के कुछ ही महीनों बाद, एक हादसे में सादिक की टांग में गंभीर चोट आई और वह चलने-फिरने से मजबूर हो गया। अब उसे अपने उसी बेटे के सहारे की ज़रूरत थी जिसके लिए उसने अपनी कमर तोड़ मेहनत की थी। शुरू में तो सब ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे बेटे के लहज़े में तल्खी आने लगी। उसे अपना बूढ़ा और बीमार बाप एक बोझ लगने लगा।

एक शाम, बेटे ने सादिक से कहा, "अब्बू, शहर में मेरा रुतबा बढ़ रहा है। आपकी यह हालत और यह पुराना घर मेरी कामयाबी में रुकावट हैं। मैंने आपके लिए शहर के बाहर एक आश्रम (Old Age Home) में बात कर ली है।"

सादिक का दिल दहल गया। जिस बेटे के लिए उसने आसमान से तारे तोड़ लाने की दुआएं मांगी थीं, वही आज उसे घर से बाहर कर रहा था। सादिक ने एक लफ्ज़ नहीं कहा। उसने बस अपना पुराना झोला उठाया और बेटे के साथ गाड़ी में बैठ गया।

जब वे आश्रम पहुँचे, तो वहां के मैनेजर ने सादिक को देखते ही गले लगा लिया और कहा, "अरे सादिक भाई! आप यहाँ?"

बेटा हैरान रह गया। उसने पूछा, "आप मेरे अब्बू को जानते हैं?"

मैनेजर की आँखों में आंसू आ गए। उसने बेटे की तरफ देखा और कहा, "हाँ, मैं इन्हें बहुत अच्छे से जानता हूँ। आज से 25 साल पहले जब मैं इस आश्रम की देखरेख करता था, तब ये यहाँ आए थे। इन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से एक अनाथ बच्चे को गोद लिया था क्योंकि इनकी अपनी कोई औलाद नहीं थी। इन्होंने उस बच्चे को पाल-पोसकर काबिल बनाने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कुर्बान कर दी।"

बेटे के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह जिसे बोझ समझकर छोड़ने आया था, वह उसका असली बाप भी नहीं था, फिर भी उसने उसे सगे बाप से बढ़कर प्यार दिया था। सादिक ने आज भी चुपचाप अपना सर झुका लिया था। बेटे को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह सादिक के पैरों में गिर पड़ा।

इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?

रिश्ते खून के नहीं, एहसास के होते हैं: एक इंसान जिसने आपको पाला है, उसका हक सगे माता-पिता से कम नहीं होता।

वक्त का पहिया: हम आज जो बोते हैं, वही कल काटते हैं। बुजुर्गों का सम्मान ही हमारी असली कामयाबी है।

इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है: सादिक ने बिना किसी लालच के एक बच्चे को पाला, जो हमें निस्वार्थ प्रेम की ताकत सिखाता है। इस तरह की और भी स्टोरी पढ़ने के लिए हमें फॉलो करें और कॉमेंट करके हमें ज़रूर बताएं 


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