शीर्षक: एक "गूंगे" पिता की चिट्ठी और वो फटा हुआ स्वेटर...
शीर्षक: खामोश मोहब्बत की चीख: एक पिता का वो बलिदान जो दुनिया नहीं जानती
गाँव की वो धूल भरी गलियाँ आज समीर को काटने को दौड़ रही थीं। समीर, जो शहर के आलीशान बंगले में रहता था, आज अपने उसी पुराने मिट्टी के घर के सामने खड़ा था जहाँ उसके पिता 'रहमान चाचा' अपनी सिलाई मशीन चलाते थे। रहमान चाचा बोल नहीं सकते थे, पर उनकी आँखों में हमेशा एक चमक होती थी—अपने बेटे समीर के लिए।
समीर जैसे ही घर के अंदर गया, उसे हर कोने से अपनी बचपन की यादें आने लगीं। उसे याद आया कैसे वह अपने पिता को "गूंगा" कहकर चिढ़ाता था जब उसे स्कूल के दोस्तों के सामने शर्मिंदगी होती थी। उसने पिता को कभी गले नहीं लगाया, कभी उनसे प्यार से बात नहीं की, क्योंकि उसे लगता था कि एक दरजी बाप उसे दे ही क्या सकता है?
बक्से का राज़
पिता के अंतिम संस्कार के बाद, समीर उनकी पुरानी अलमारी समेटने लगा। नीचे एक छोटा सा संदूक मिला। उसे खोलते ही समीर की रूह कांप गई। उसमें समीर के बचपन से लेकर जवानी तक की हर छोटी-बड़ी उपलब्धि के अखबार की कटिंग रखी थी। और सबसे नीचे था—वो पुराना नीला स्वेटर।
यह वही स्वेटर था जिसे समीर ने दसवीं क्लास में यह कहकर फेंक दिया था कि "इसे पहनकर मैं भिखारी लगता हूँ।" लेकिन आज वह स्वेटर सिला हुआ था, उस पर जगह-जगह रफू किया गया था।
डायरी का वो पन्ना (The Core Knowledge)
स्वेटर के नीचे एक डायरी मिली। रहमान चाचा पढ़ना-लिखना तो नहीं जानते थे, लेकिन उन्होंने टूटी-फूटी हिंदी में कुछ शब्द लिखे थे। आखिरी पन्ने पर लिखा था:
"बेटा समीर, मुझे पता है तुझे मुझसे शर्म आती है क्योंकि मैं बोल नहीं सकता। शायद खुदा ने मेरी जुबान इसलिए छीन ली ताकि मैं कभी तुझे डांट न सकूँ, सिर्फ प्यार कर सकूँ। लोग कहते हैं कि तू शहर में बहुत बड़ा आदमी बन गया है। सुनकर कलेजा गर्व से भर जाता है।
लोग पूछते हैं कि मैंने तुझे इतना बड़ा कैसे बनाया? उन्हें नहीं पता कि जिस रात तू शहर पढ़ने जा रहा था, मेरे पास तेरी फीस के पैसे नहीं थे। मैंने अपनी एक किडनी बेचकर वो पैसे जुटाए थे। डॉक्टर ने कहा था आराम करने को, पर सिलाई मशीन न चलाता तो तुझे पैसे कैसे भेजता? उस फटे स्वेटर को मैंने संभाल कर रखा है, क्योंकि उसकी हर सिलाई में तुम्हारी याद बसी है। अगर कभी वक्त मिले, तो इस पुराने घर में अपनी यादें छोड़ जाना।"
समीर का पछतावा
समीर के हाथ कांपने लगे। उसे याद आया कि कैसे वह शहर में महँगी गाड़ियों में घूमता था और यहाँ उसका बाप एक-एक टांके के लिए अपनी जान लगा रहा था। उसे अपनी कामयाबी राख लगने लगी। वह चिल्ला-चिल्ला कर रोना चाहता था, पिता के पैर पकड़कर माफी मांगना चाहता था, पर अब सामने सिर्फ यादें थीं और वो खामोश दीवारें।
इंसानियत का पाठ (Conclusion for Readers)
हम अक्सर चमक-धमक की दुनिया में उन "नींव के पत्थरों" को भूल जाते हैं जिन्होंने हमें खड़ा किया है। माँ-बाप का प्यार किसी शब्द या भाषा का मोहताज नहीं होता। उनकी खामोशी में भी दुआएं होती हैं।
अक्सर जब तक हमें समझ आता है कि हमारे माता-पिता हमारे लिए क्या थे, तब तक हमारे पास सिर्फ़ उनकी यादें और पछतावा बचता है। वक़्त रहते अपनों को गले लगा लीजिये, इससे पहले कि वो मिट्टी की चादर ओढ़ कर सो जाएँ।
लेखक का संदेश: अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो आज ही अपने माता-पिता से बात करें और उन्हें बताएं कि आप उनसे कितना प्यार करते हैं।
ये कहानी अगर पसंद आए तो लाईक और मेरे ब्लॉग अल्फाज़ से जोड़े रहें

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