शैतान का आखिरी पहर"

Are you brave enough to face the darkness? ALFAAZ BY SALMAN presents "The Devil's Last Hour," a spine-chilling horror story that will shake you to you








अमावस की एक काली रात और एक भूली-बिसरी हवेली का रहस्य।

अमावस की काली रात थी। आसमान में एक भी तारा नहीं चमक रहा था, मानो कायनात ने अपनी आँखें बंद कर ली हों। हवा बिलकुल थम सी गई थी, लेकिन पेड़ों के पत्तों की सरसराहट ऐसी लग रही थी जैसे कोई अदृश्य साया उनके बीच चल रहा हो। विक्रम अपनी कार से एक सुनसान जंगल के रास्ते से गुजर रहा था। वह शहर की भीड़-भाड़ से दूर, शॉर्टकट के चक्कर में इस पुराने रास्ते पर आ गया था, जिसे स्थानीय लोग "मौत का गलियारा" कहते थे।

​घड़ी में रात के 2 बज रहे थे। अचानक, कार की हेडलाइट्स फड़फड़ाने लगीं और इंजन एक अजीब सी घरघराहट के साथ बंद हो गया। विक्रम ने कार स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन ने कोई जवाब नहीं दिया। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही सांसों की आवाज हथौड़े जैसी लग रही थी। उसने मोबाइल निकाला—नेटवर्क गायब था। बाहर घना अंधेरा और जंगल की भयानक खामोशी।

​मजबूरन, विक्रम कार से बाहर निकला। बाहर कदम रखते ही उसे ठंड का एक ऐसा झोंका लगा जो हड्डियों तक उतर गया। यह ठंड मौसम की नहीं थी, यह किसी रूहानी मौजूदगी की ठंडक थी। दूर, बिजली की हल्की चमक में उसे एक पुरानी, जर्जर हवेली दिखाई दी। उसके पास कोई चारा नहीं था। उसने सोचा कि शायद वहां कोई मदद मिल जाए या कम से कम रात बिताने की जगह।

​जैसे-जैसे वह हवेली के करीब बढ़ा, हवा में सड़े हुए मांस की एक तीखी बदबू आने लगी। हवेली का मुख्य द्वार लकड़ी का था, जिस पर दीमक लगी हुई थी और वह आधा खुला हुआ था। विक्रम ने दरवाजा धक्का दिया। एक लंबी, कानों को चीर देने वाली 'चरमराहट' के साथ दरवाजा खुला। अंदर घुप अंधेरा था। विक्रम ने अपने फोन की फ्लैशलाइट जलाई। रोशनी की पतली लकीर ने धूल से भरी एक विशाल लॉबी को उजागर किया। दीवारों पर मकड़ी के जाले लटक रहे थे और फर्श पर अजीब से काले धब्बे थे, जो सूखे हुए खून जैसे लग रहे थे।

​"कोई है?" विक्रम की आवाज़ गूंजी, लेकिन जवाब में सिर्फ उसकी अपनी ही आवाज़ डरावने तरीके से वापस लौटी—"है... है... है..."

​तभी, ऊपरी मंजिल से किसी के चलने की आवाज़ आई। छम... छम... छम...

यह पायल की आवाज़ थी, लेकिन यह मधुर नहीं थी। यह भारी और भयानक थी, जैसे कोई भारी पैरों में लोहे की जंजीरें बांधकर चल रहा हो। विक्रम का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने ऊपर जाने वाली सीढ़ियों की तरफ टॉर्च घुमाई। वहां कोई नहीं था। लेकिन सीढ़ियों की रेलिंग पर एक ताज़ा, गीले हाथ का निशान था।

​हिम्मत करके विक्रम ऊपर की ओर बढ़ा। हर कदम पर लकड़ी की सीढ़ियाँ ऐसे चीख रही थीं जैसे उन्हें दर्द हो रहा हो। ऊपर पहुँचते ही उसे एक कमरे से हल्की सिसकियों की आवाज़ सुनाई दी—जैसे कोई बहुत दर्द में रो रहा हो। वह आवाज़ उसे एक कमरे की ओर खींचने लगी। दरवाजा आधा खुला था।

​विक्रम ने जैसे ही कमरे में झांका, उसका खून जम गया। कमरे के बीचो-बीच एक पुरानी रॉकिंग चेयर (झूलने वाली कुर्सी) रखी थी। उस पर कोई बैठा था। एक औरत। उसके बाल लंबे और बिखरे हुए थे, जो उसके चेहरे को ढके हुए थे। वह एक पुरानी, फटी हुई लाल साड़ी पहने हुए थी। वह धीरे-धीरे आगे-पीछे झूल रही थी और वही भयानक सिसकियों की आवाज़ निकाल रही थी।

​"सुनिए?" विक्रम ने कांपती आवाज़ में पूछा।

​कुर्सी का झूलना अचानक रुक गया। सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि विक्रम को लगा उसका दिल फट जाएगा।

उस औरत ने धीरे-धीरे अपनी गर्दन घुमाई। लेकिन उसका धड़ नहीं घुमा। सिर्फ गर्दन... पूरी 180 डिग्री पीछे घूम गई। हड्डियों के चटकने की कड़-कड़-कड़ आवाज़ ने पूरे कमरे को भर दिया।

​जब विक्रम ने उसका चेहरा देखा, तो उसके पैरों से ज़मीन खिसक गई। उसका कोई चेहरा नहीं था। जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे जिनमें से गाढ़ा काला खून बह रहा था। उसका मुँह अजीब तरह से बड़ा और खुला हुआ था, जिसमें दाँत नहीं, बल्कि नुकीली कीलें थीं।

​वह औरत—या वह जो भी चीज़ थी—अचानक एक अमानवीय चीख के साथ कुर्सी से उठी। उसकी चीख किसी जानवर की नहीं, बल्कि नर्क की आग में जलती हुई हज़ारों रूहों की चीख जैसी थी। विक्रम पीछे हटा, लेकिन दरवाजा अपने आप ज़ोर से धड़ाम से बंद हो गया।

​अब वह कमरा बदलने लगा। दीवारों से खून रिसने लगा। फर्श पर कीड़े रेंगने लगे। वह चुड़ैल हवा में तैरती हुई विक्रम की ओर बढ़ने लगी। उसके पैर ज़मीन पर नहीं थे।

"तू यहाँ क्यों आया?" एक भारी, गूंजती हुई आवाज़ आई जो उस चुड़ैल के मुँह से नहीं, बल्कि दीवारों से आ रही थी। "यहाँ जो आता है, वो हमारा हिस्सा बन जाता है।"

​विक्रम ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह लॉक था। उसने लात मारी, लेकिन लकड़ी पत्थर जैसी सख्त हो गई थी। चुड़ैल अब उसके बिल्कुल करीब थी। विक्रम को उसके मुंह से आती सड़ी हुई लाश की बदबू आ रही थी। उसने अपना सड़ा-गला हाथ विक्रम के गले की ओर बढ़ाया। उसके नाखून खंजर जैसे लंबे और काले थे।

​विक्रम ने अपनी आँखें बंद कर लीं और भगवान को याद करने लगा। तभी उसे अपने कान के पास एक ठंडी सांस महसूस हुई। किसी ने उसके कान में फुसफुसाया, "भगवान यहाँ नहीं आते, विक्रम..."

विक्रम ने झटके से आँखें खोलीं—वह जानता था मेरा नाम! यह चीज़ उसे जानती थी।

​अचानक, कमरे की खिड़की हवा के तेज़ झोंके से टूटकर खुल गई। विक्रम ने बिना सोचे खिड़की की तरफ छलांग लगा दी। वह पहली मंजिल से नीचे गीली मिट्टी पर गिरा। दर्द से उसकी चीख निकल गई, शायद पैर की हड्डी टूट गई थी। लेकिन रुकने का वक्त नहीं था। वह लंगड़ाते हुए, घिसटते हुए अपनी कार की ओर भागा।

​पीछे से हवेली से एक साथ सैकड़ों लोगों के हंसने की आवाज़ें आ रही थीं। विक्रम कार के पास पहुँचा, कांपते हाथों से चाबी लगाई। इस बार, किस्मत ने साथ दिया और इंजन चालू हो गया। उसने एक्सीलेटर दबाया और कार को भगा दिया।

​उसने रियर-व्यू मिरर (पीछे देखने वाले शीशे) में देखा। हवेली के गेट पर वही लाल साड़ी वाली औरत खड़ी थी। वह मुस्कुरा रही थी। और उसके हाथ में... विक्रम का फोन था, जो जल्दबाजी में वहीं गिर गया था।

​विक्रम ने कार की स्पीड बढ़ा दी। वह उस जंगल से बाहर निकल आया, पसीने से लथपथ और बुरी तरह हांपता हुआ। उसे लगा कि वह बच गया। शहर की रोशनियां दिखाई देने लगीं। उसने राहत की सांस ली।

​वह अपने घर पहुँचा। सुबह के 4 बज रहे थे। वह दौड़कर अपने बेडरूम में गया, दरवाजा लॉक किया और रजाई में घुस गया। उसका पूरा शरीर बुखार की तरह तप रहा था और कांप रहा था। उसे अभी भी अपनी नाक में उस सड़े हुए मांस की बदबू महसूस हो रही थी।

​तभी, उसके बेड के साइड टेबल पर रखा उसका दूसरा फोन बजा। उसने कांपते हाथों से फोन उठाया। एक नोटिफिकेशन आया था।

यह एक 'वॉयस मैसेज' था।

नंबर अनजान था।

उसने डरते-डरते मैसेज प्ले किया।

​फोन से आवाज़ आई—वही गूंजती हुई, खौफनाक आवाज़:

"विक्रम... तुम अपना फोन तो वहीं भूल आए... लेकिन कोई बात नहीं... मैंने तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ा है। जरा अपनी रजाई के अंदर तो देखो..."

​विक्रम का खून जम गया। उसे अपनी रजाई के अंदर, अपने पैरों के पास, कुछ ठंडा और भारी महसूस हुआ। रजाई के अंदर से धीरे-धीरे कुछ ऊपर की तरफ रेंग रहा था। एक सड़े हुए हाथ ने उसका टखना जकड़ लिया।

​विक्रम चीखना चाहता था, लेकिन उसकी आवाज़ गले में ही घुट गई। अंधेरे कमरे में, रजाई के अंदर, दो चमकती हुई लाल आँखें उसे घूर रही थीं। और फिर... सन्नाटा छा गया।

अगली सुबह: पुलिस को विक्रम के कमरे का दरवाजा तोड़ना पड़ा। कमरा अंदर से बंद था। खिड़कियाँ बंद थीं। लेकिन विक्रम गायब था। पूरे कमरे में, दीवारों पर और छत पर, काले कीचड़ जैसे पैरों के निशान थे। और बेड के पास, फर्श पर, विक्रम का वह फोन पड़ा था... जो वह हवेली में गिरा आया था। फोन की स्क्रीन पर एक सेल्फी थी—जिसमें विक्रम सो रहा था और उसके ठीक पीछे वह सड़ा हुआ, बिना आँखों वाला चेहरा मुस्कुरा रहा था।

​वह रात विक्रम की आखिरी रात थी, लेकिन उस हवेली की भूख अभी शांत नहीं हुई है।

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